Best Motivational articles for students

अगर आप Motivational articles for Students ढूंढ रहे है तो आप बिल्कुल सही जगह आए है, हमनें इस पोस्ट में स्टूडेंट को कैसे वर्तमान में केंद्रित रहना है; वह बताया है।

Student किसी भी देश का भविष्य है, अगर वो motivated रहेगा तो देश और समाज की तरक्की में भागीदारी निभा सकता है।

Article 1st :- वर्तमान में केंद्रित रहना सीखें

प्रतिकूलता देखकर संतुलन ना खोए। दिन और रात की तरह मनुष्य जीवन में प्रिय और अप्रिय घटना क्रम आते जाते रहते हैं। इन उभयपक्षीय अनुभूतियों के कारण जीवन की शोभा और सार्थकता है। अनुकूल और प्रतिकूल के कारण उपलब्ध होने वाली असुविधा असुविधा का उतना ही महत्व नहीं, जितना मानवीय सद्गुणों का।पुरुषार्थ, साहस, धैर्य, संतुलन, दूरदर्शिता जैसे गुणों का विकास और परीक्षण प्रतिकूल परिस्थितियों में ही संभव है।यदि सदा अनुकूलता बनी रहे तो फिर ढर्रे का जीवन जीने वाले लोग गुणों की दृष्टि से पिछड़ा ही रहेंगे इस प्रकार के विकास की उन्हें आवश्यकता ही अनुभव न होगी। अनुकूल स्थिति से लाभ उठाकर हम अपनी सुविधा साधनों को बढ़ाएं और प्रतिकूलता के पत्थर से खींच कर अपनी प्रतिभा पहनी करें यह उचित है और यही उपयुक्त है।

कई व्यक्ति प्रतिकूल स्थिति में मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और बेहिसाब दुखी रहने लगते हैं। एक बार प्रयत्न करने पर कष्ट दूर नहीं हुआ या सफलता नहीं मिली तो निराश हो बैठते हैं। कई व्यक्ति इस से भी आगे बड़े-चढ़े होते हैं और बैठे ठाले भविष्य में विपत्ति आने की आशंका करते रहते हैं। प्रस्तुत और सुविधा के समाधान का पुरुषार्थ करें, उपाय सोचें, इसकी अपेक्षा वे चिंता, भय, निराशा, आशंका जैसी उलझन खड़ी करके अपने को उस में फंसा लेते हैं और वाह निर्मित एक नई विपत्ति गडकर खड़ी कर लेते हैं।

चिंता ग्रस्त रहने वाले लोग निश्चिंत व्यक्तियों की अपेक्षा कहीं अधिक घाटे में रहते हैं। जितना समस्याओं में उलझा रहेगा उतना ही वह समस्या सुलझाने में असमर्थ हो जाएगा। क्रोधी, आवेश ग्रस्त, उत्तेजित आक्रोश से भरे हुए दिमाग एक प्रकार से विक्षुब्ध जैसे हो जाते हैं। कई तथ्यों पर ध्यान रखते हुए सही निष्कर्ष निकालना उनके काबू से बाहर की बात हो जाती है। चिंता का कारण दूर करना तो दूर ऐसे लोग शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गवांकर दोहरी हानि उठाते हैं। अपने आप को असमर्थ, असहाय, अपंग और अनाथ मानने से चिंता ग्रस्त मनोस्थिति बनती है। साहसी व्यक्ति कठिनाइयों को अपने पुरुष के लिए एक चुनौती मानता है। आप में विश्वास ही अपने पुरुषार्थ के बल पर पड़ी दिखने वाली कठिनाइयों को तुच्छ सिद्ध करते हैं।

कठिनाइयों से ग्रस्त व्यक्ति भी यदि धैर्य और संतुलन से काम ले तो उन्हें कोई ना कोई रास्ता अवश्य मिल सकता है। वर्तमान पर केंद्रित रहना सीख लिया जाए तो चिंता करने के लिए न तो अवसर ही मिलेगा और न ही आवश्यकता ही प्रतीत होगी। जिसे बदला नहीं जा सकता उसे शांति के साथ सहन करना चाहिए। कठिनाइयों की घड़ी में अपेक्षाकृत अधिक साहस और अधिक पुरुषार्थ की जरूरत पड़ती है। इन दिनों महान अवलंबनों चिंता की आग में जलाकर स्वयं असहाय बन जाने में कुछ बुद्धिमानी की बात नहीं।

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Article 2nd :- कमी है तो बस हमारे प्रयासों की

आवश्यक नहीं कि सदा सहयोगी और पूर्व परिचित मिलते रहे, फिर जहां पहले से हलचलें मौजूद है, वहीं स्वयं ही जाकर फिट हो जाना किसी प्रतिभाशाली धर्म प्रचारक के लिए कोई बड़े गौरव की बात नहीं है। बनेबनाए, सजेसाजाए स्टेज पर जा बैठना सामान्य व्यसन हो गया है। ऐसी सस्ती नेतागिरी के लिए हर गली मुहल्ले में प्यासे फिरने वाले महत्वाकांक्षी लोग मिल जाएंगे। इसी धंधे को अपने लोग भी अपना बैठे तो फिर प्रतिभा की परख कहां होगी। वस्तुतः श्रेय वक्ताओं का नहीं, आयोजकों और व्यवस्था करने वालों का होता है। पसीना तो उन्हें ही बहाना पड़ता है, वजन तो उन्हीं पर पड़ता है, सूझ बूझ और दौड़ धूप उन्हीं की होती है। लगातार समय देकर साथी सहयोगी समेटकर साधन जुटाकर जिसने व्यवस्था बनाई है, सहराना उसीकी, की जानी चाहिए। कर्मठता उसीकी ही फलवती हुई।

सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं को उपयुक्त ढंग से जनता के सामने उपस्थित किया जाय तो प्रतीत होगा कि मनुष्य के भीतर रहने वाला देवत्व अभी पूर्णतया मरा नहीं है। उस सींचा, उभारा जा सकता है। सत्प्रयोजनों की प्रेरणा देने वाले यदि लोक मानस को समझते हो, उसे ठीक तरह स्पर्श करना जानते हों तो यह प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा कि जनता ने सत्प्रवृत्तियों को अपनाने और उनमें सहयोग देने का द्वार बंद नहीं किया है। इस दिशा में प्रयत्न करने वालों के समर्थन प्रोत्साहन की कमी नहीं रहती। कमी केवल प्रस्तुकर्ता के शिथिल मनोबल की रहती है। यदि प्रचारकों की निष्ठा और चेष्ठा प्रखर हो तो कोई कारण नहीं की जनमानस को पतन से मोड़कर उत्थान की दिशा में नियोजित करने में सफलता प्राप्त न कि जा सके?

बौद्ध प्रचारक ग्रहण श्रद्धा का संबल लेकर अपने मिशन और संकल्प पल के लिए ही जीवित रहे, उसी के लिए अपनी सांस का उपयोग करते रहे, कठिनाइयों को उन्होंने कठिनाई नहीं समझा, भूख-प्यास और शीत-ग्रीष्म की परवाह न करते हुए मौत से जूझते हुए शब्दभेदी बाण कि अपने लक्ष्य की ओर चले थे और धरती पर रहने वाली जनता को महान धर्म के झंडे तले लाने में समर्थ हुए। हमारी लगन भी यदि उसी स्तर की हो तो वह सब कुछ संभव एवं सरल हो सकता है जो आज कठिन तथा असंभव का आज कठिन तथा असंभव कहा, समझा जाता है।

अखंड ज्योति जनवरी १९७४


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