Best 5 महापुरुषों की प्रेरक कहानियां | short story

दोस्तों हम लोग आपके साथ अक्सर shayari, Poetry, Quotes, Inspiring thought,आपके साथ शेयर करते रहते हैं लेकिन हम इस बार महापुरुषों की प्रेरक कहानियां शेयर कर रहे हैं। ये कहानियां हमारे प्रेरणा के स्रोत हमारे महापुरषों के जीवन में घटित घटनाओं पर आधारित होगी..

यह महापुरुषों की प्रेरक कहानियां बच्चों के लिए भी है; साथ ही साथ हमारे युवाओं के लिए, इन कहानियों की शिक्षा वे अपने जीवन में उतार कर खुद को समाज को उन्नत बना सके।

1. अब्राहम लिंकन

महापुरुषों की प्रेरक कहानियां, Abraham Lincoln

अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से पहले लिंकन ने एक बार काली स्त्री को जंजीरों से घसीटे जाते देखा। वह गुलाम थी, उसके मालिक उसे कहीं ले जा रहे थे और यातनाएं दे रहे थे। वह रो रही थी, इस बर्बरता पर उन्हें घोर दुःख हुआ और उन्होंने उस प्रथा का अंत कराने की प्रतिज्ञा की। उन्होंने राजनीति में प्रवेश लिया और चुनाव लड़कर राष्ट्रपति बने।

गुलाम प्रथा को लेकर दक्षिणी अमेरिका के साथ उनका गृहयुद्ध आरंभ हो गया, जिसमें उन्होंने विजय प्राप्त की। उन्होंने युद्ध संचालन का कार्य बुद्धिमत्ता से किया और देश को गुलामी की प्रथा से मुक्त कराया। ऐसा उनका दृढ़ संकल्प था।

2. महात्मा गांधी

महापुरुषों की प्रेरक कहानियां, महात्मा गांधी

स्वाधीनता संग्राम के दिनों में गांधी जी बिहार के दौरे पर थे। वायसराय ने उन्हें आवश्यक चर्चा हेतु बुलाया। बापू जी ने दिल्ली जाने की तैयारियां की। उनके साथियों ने उन्हें प्रथम दरजे की रेलयात्रा करने की सलाह दी। गांधी जी बोले – “जिस सवारी में भारत का हर नागरिक नहीं बैठ सकता, उसमे मै क्यों बैठूं?” उन्होंने अपने लिए तीसरे दरजे की रेलयात्रा का टिकट लेने को कहा। उनके सहयोगी ने उनके लिए ऐसा डिब्बा चुना, जिसके दो भाग थे। एक भाग सामान के लिए और दूसरा भाग गांधी जी के बैठने के लिए।

गांधीजी ने जब खिड़की से बाहर झांका तो उन्होंने देखा कि अनेक यात्री दरवाजा पकड़कर लटके हुए यात्रा कर रहे हैं। गांधी जी को बहुत दुख हुआ कि मेरे लिए दो डिब्बे लिए गए है; जबकि अन्य यात्री इतनी असुविधा में यात्रा कर रहे हैं। उन्होंने अपना सामान उसी डिब्बे में रख लिया और दूसरा डिब्बा अन्य यात्रियों के लिए खुलवा दिया। वे औसत नागरिक की सुविधाओं से ज्यादा सुविधाओं का उपयोग कभी नहीं करते थे।

3. सदाचार और संयम

महापुरुषों की प्रेरक कहानियां बच्चों के लिए

देवों और असुरों में घोर युद्ध हो रहा था। राक्षसों के शस्त्रबल और युद्ध कौशल के सम्मुख देवता टिक नहीं पा रहे थे। वे हारकर जान बचाकर और महर्षि दत्तात्रेय के पास पहुंचकर उनसे अपनी विपत्ति की गाथा का सुनाई। महर्षि ने उन्हें धैर्य बांधते हुए पुनः लड़ने को कहा। फिर लड़ाई हुई, किन्तु देवता फिर हर गए और जान बचाकर पुनः महर्षि दत्तात्रेय की शरण में पहुंचे। इस बार असुरों ने भी उनका पीछा किया। वे भी महर्षि दत्तात्रेय के आश्रम में आ पहुंचे।

असुरों के आश्रम में प्रविष्ट होने पर उनका स्वागत एक नवयुवती स्त्री ने किया। बस, दानव लड़ना भूल गए और उस पर मुग्ध हो गए। वह नवयुवती और कोई नहीं, बल्कि रूूप बदले हुए लक्ष्मी जी ही थीं। महर्षि दत्तात्रेय ने अब देवताओं से कहा – “अब तुम तैयारी करके, फिर से असुरों पर चढ़ाई करो।” लड़ाई छिड़ी और इस बार देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। असुरो का पतन हुआ। विजय प्राप्त करके देवता फिर दत्तात्रेय के पास आ गए और पूछने लगे – ” महर्षि! दो बार पराजय मिलने पर और अंत में विजय प्राप्त होने के पीछे का क्या रहस्य है?”

महर्षि दत्तात्रेय ने उत्तर दिया -“जब तक प्राणी सदाचारी व संयमी रहता है, तब तक उसका पुण्यबल। विद्यमान रहता है और वह कुपथ पर बढ़ चलता है तो उसका आधा बल क्षीण हो जाता है। परनारी का अपहरण करने कि कुचेष्टा में असुरों का आधा बल नष्ट हो गया था, तभी तुम उन पर विजय प्राप्त कर सके।

4. मूर्खता

महापुरुषों की प्रेरक कहानियां

किसी समय एक जंगल में गधे ही गधे रहते थे। पूरी आज़ादी से रहते, भरपेट खाते पीते और मौज करते। एक लोमड़ी को मज़ाक सूझा। उसने मुंह लटकाकर गधों से कहा -“मैं चिंता से मरी जा रही हूं और तुम इस तरह मौज कर रहे हो। पता नहीं, कितना बड़ा संकट सिर पर आ पहुंचा है।” गधों ने कहा – “दीदी! भला क्या हुआ? बात तो बताओ।” लोमड़ी ने कहा – “मैं अपने कानों से सुनकर आती हूं। मछलियों ने एक सेना बना ली है और वो अब तुम्हारे ऊपर चड़ाई करने ही वाली है। उनके समाने तुम्हारा ठहर सकना कैसे संभव होगा?”

गधे असमंजस में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि व्यर्थ जान गंवाने से क्या लाभ। चलो कहीं अन्यत्र चलो। जंगल छोड़कर वे गांव की ओर चल पड़े। इस प्रकार घबराए हुए गधों को देखकर गांव के धोबी ने उनका खूब सत्कार किया। अपने छप्पर में आश्रय दियाैर गले में रस्सी डालकर खूंटे में बांधते हुए बोला – “डरने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं। मछलियों से मैं निपट लूंगा। तुम मेरे बाड़े में निर्भरतापूर्वक रहो। केवल मेरा थोड़ा सा बोझ ढोना पड़ेगा।”

Conclusion :- अपनी मूर्खता के कारण गधों ने अपनी आज़ादी तब से खो दी।

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5. राजा भोज और किसान

Mahapurushon ki prerak kahaniyanराजा भोज अपने मंत्री के साथ यात्रा पर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक किसान को उबड़ खाबड़ पर गहरी नींद में सोते देखा। राजा ने मंत्री से पूछा – “ऐसी ऊंची नीची ढेले और कंकड़ों से भरी जमीन पर या किसान इतनी गहरी नींद कैसे सो लेता है? हमें तो थोड़ा कष्ट होने पर भी नीेंद नहीं उचट जाती है।” मंत्री ने कहा – “महाराज! यह सब अभ्यास और परिस्थिति पर निर्भर है। मनुष्य से अधिक कोई कठोर नहीं और न ही उससे अधिक कोई कोमल होता है। परिस्थितियां मनुष्य को अपने अनुकूल बना लिया करती है।”

यह बात राजा को पूरी तरह से नहीं जंची। उन्होंने मंत्री से कहा – “वे इस कथन की परीक्षा लेना चाहेंगे।” मंत्री ने सहमति व्यक्त की। दोनों ने सलाह करके उस किसान को राजकमल में रखने का निर्णय किया, जिससे कुछ दिन राजसी ठाठ-बाट से रखकर उसकी जांच की जा सके। महल में पहुंचने पर राजा ने उसके खाने-पीने और सोने का बढ़िया-से-बढ़िया इंतजाम किया। उसको खूब आराम से रखा जाने लगा। इस तरह कुछ महीने बीत गए और किसान वैसे ही राजसी जीवन का अभ्यस्त हो गया।

प्रयोग का अंतिम दिन आ पहुंचा। मंत्री ने किसान पलंग के गद्दे के भीतर कुछ पत्ते और तिनके चुपके से रखवा दिए। राजा छिपकर देखने लगा कि देखे इस परिवर्तन का क्या परिणाम होता है? किसान रात भर करवटें बदलता रहा, उसे नींद नहीं आई। सवेरे राजा उसके पास पहुंचे तो उसने शिकायत की की गद्दे में कुछ गड़ने वाली चीज मालूम होती है, जिससे उसकी नींद रात भर बाधित रही। मंत्री ने कहा – “महाराज! यह वही किसान है, जो ढेलों के बीच चैन से सोता था। आज इसे पलंग पर बिछे रूई के गद्दे मै तिनके चुभ रहे हैं। यह अभ्यास का अंतर है।” राजा भोज अब मंत्री कि बात से पूर्ण रूप से सहमत थे।


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